याद आता है वह समय,
जहाँ नारी का गुणगान था होता।
तब यही कहते थे सब,
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।।🙏🙏
फिर समय कुछ ऐसा आया,
जब स्त्री पर्दे में रहा करती थी।
पुरुष - प्रधान समाज के ताने
दिन-रात सहा करती थी ।।🙎
होनी चाहिये जहाँ पर पूजा,
वहां नारी को डराया जाता था।
कम दहेज़ के लिये उसे,
अग्नि की भेंट चढ़ाया जाता था।।💸🔥
धीरे-धीरे जब युग बदला।।
आधुनिकता था जिसका कारण ।
तब प्रताड़ित नारी ने भी किया,
अबला से सबला का रूप धारण।।🙅🙋
आकर पर्दे की कैद से बाहर,
करके सती-प्रथा का बहिष्कार।
कंधे - से - कंधा मिलाकर पुरुषों से,
किया नव नारी युग का अविष्कार।।👌👍
खुले संसार में ही नहीं,
आज नारी चाँद पर भी पहुँच चुकी।
जीवन के हर क्षेत्र में ,
पुरूषों को है वह पछाड़ चुकी।।🌜
किन्तु कुछ लोग इस समाज के,
स्वतंत्र जीने नहीं देते नारी को।
अपने अनुचित फायदों के लिए,
मार डालते है असहाय, बेचारी को ।।
अब सुनो, हे! पूजनीय नारी,
सामाजिक प्रताड़ना की मारी।
मत सहो अब कोई अत्याचार,
तोड़ दो गुलामी की जंजीरें भारी।।⛓🚫
बन जाओ तुम कल्पना चावला,
लक्ष्मी बाई, मदर टेरेसा,
याद रखे यह दुनिया तुझे,
काम करो कुछ नया ऐसा।।✌👌
नारी के उचित कल्याण हेतु,
अब हम कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगे।
नारी-साक्षरता व अधिकार देकर,
नव-समाज और नव-राष्ट्र का निर्माण करेंगें।।
धन्यवाद
🙏🙏🙏🙏🙏

Wonderful
ReplyDeleteNyc dear
ReplyDeleteSuperb and amazing poem. A sad and true poem. There is something about the way you put down your words so magically. I really like your use of words. Thank you for sharing this poem.
ReplyDeleteAmazing
ReplyDeleteAmazing
ReplyDeleteThanks to all.💐💐
ReplyDeleteGreat
ReplyDeleteKudos to uhh✌��
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